🌴०८ अगस्त २०२५ शुक्रवार 🌴
।।श्रावण शुक्लपक्षचतुर्दशी २०८२ ।।
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‼️ऋषि चिंतन ‼️
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❗➖नरक से बाहर निकलें ➖❗
‼️— स्वर्ग अपने अंदर ही पाएं– ‼️
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हम “मनुष्य” स्तर से गिरकर “पशु” और “पिशाच” स्तर की जिंदगी जीते हैं, तो वासना, तृष्णा और अहंता जैसे दोष-दुर्गुणों का आवेश इस तरह सिर पर चढ़ जाता है कि मनुष्य वह सब कुछ करता है, जो नहीं करना चाहिए था। ऐसी गिरी हुई सोच व आचरण का नतीजा शारीरिक और मानसिक रोगों के रूप में सामने आता है। चारों ओर अपयश और अविश्वास का माहौल बनता है। हृदय पश्चाताप की आग में झुलसता रहता है। बाहर राजदंड, समाज दंड और प्रतिशोध का डर अलग से सताता रहता है। अपनी मान-मर्यादा को तोड़कर किए बुरे कर्मों के फल का मिला-जुला रूप ही वह नरक बन जाता है, जिसमें घोर यातना, असह्य पीड़ा और सर चकराने वाली दुर्गंध भरी होती है।
👉 ऐसी “नरक” की यातना भोगने का कष्ट भरा अनुभव जिसको भी मिला हो, उसे विचार करना चाहिए कि ऐसा क्यों है ? क्या इस कष्ट से छुटकारा नहीं मिल सकता ? विचार करने पर स्पष्ट हो जाएगा कि इसका एकमात्र कारण अपने शरीर को जरूरत से ज्यादा महत्व देना है। हम उसी को अपना असली रूप मान बैठते हैं और उसी को सुखी बनाने के लिए घटिया और नीच कर्म करते रहते हैं, जिसका फल आखिर में ऐसे हालात खड़े करता है, जिसमें हमें तपते नरक में झुलसने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
👉 इस “नरक” से बचने व इसी जीवन में “स्वर्ग” जैसा सुख पाने का एक ही रास्ता है और वह है-अपनी सोच के तरीके में बदलाव। हमें अपने शरीर की जगह अपने असली रूप को महत्त्व देना होगा, अपने ईश्वरीय अंश को जगाना होगा व अच्छे गुणों को बढ़ाना होगा। शरीर को जीवन यात्रा के एक यंत्र के रूप में ही जरूरी ध्यान दिया जाए और अपनी सौंपी गई जिम्मेदारी के प्रति जागरुक रहें।
👉 अपने को ईश्वर का अंशधर मानने और अपनी सोच, स्वभाव और व्यवहार को इसके अनुरूप ढालने की कोशिश ही उस शक्ति को जगाती है, जो “नरक” में भी “स्वर्ग” खड़ा कर देती है। इसी आधार पर “संत इमर्सन” ने कहा था कि “मुझे “नरक” में भेज दो, मैं वहाँ भी “स्वर्ग” बना दूँगा। अच्छी सोच स्वर्ग का रास्ता खोलती है, तो घटिया सोच नरक का। सुधरी हुई सोच के साथ कर्म भी सुधरने लगते हैं। सीधे रास्ता पकड़ने पर भटकने की गुंजाइश नहीं रहती। इसी तरह से डर और आकर्षण भी धीरे-धीरे हलके पड़ने लगते हैं।
👉 “शानदार सोच” और “श्रेष्ठ आचरण” की पर्याप्त मात्रा अपनाना ही “देव जीवन” है। भगवान मनुष्य से इसी जीवन की उम्मीद करता है। हर पिता अपने पुत्र से यही चाहता है कि अपनी परंपरा और प्रतिष्ठा बनी रहे। भगवान की भी अपने युवराज से यही आशा है कि अपने अंदर के अच्छे गुणों वाले ईश्वरीय अंश को जगाए, उसको जिंदा करे और श्रेष्ठ जीवन जिए, जिससे कि उसके आस-पास का वातावरण भी “स्वर्ग” जैसा सुंदर और मधुर बन जाए। मनुष्य को दुनिया की सबसे श्रेष्ठ रचना बनाकर भेजने का यही उसका उद्देश्य भी है।
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मानव जीवन की गरिमा पृष्ठ २९
🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁
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